Sunday, November 22, 2015

रास्ते में इम्तहान होता जरूर है...


क्या हुआ जो
कुछ मिला तो
कुछ नहीं मिला,
क्या हुआ जो
कुछ खो गया तो
कुछ छिन गया...
देखो तो जरा गौर से
रह गया होगा बहुत कुछ
अब भी तुम्हारे पास,
देखो आ गया होगा 
कुछ कीमती-कुछ खास
चुपके से तुम्हारे पास...
और अगर नहीं 
तो रुको जरा 
थोड़ा सब्र करो,
क्योंकि -
देर या सबेर 
वो देता जरूर है,
उजाला कभी ना कभी
होता जरूर है,
याद रहे मकसद 
छोटा हो या बड़ा हो,
पर रास्ते में इम्तहान
होता जरूर है...

- विशाल चर्चित

Monday, November 16, 2015

अरे जिन्दगी जाग जा - जाग जा...


Saturday, September 05, 2015

हे माखन के चोर तुम्हारा स्वागत है...


हे माखन के चोर तुम्हारा स्वागत है
हे राधा चितचोर तुम्हारा स्वागत है
आओ लाओ सतयुग त्रेता द्वापर तुम
ये कलियुग घनघोर तुम्हारा स्वागत है...

छेड़ो ऐसी बंसी की धुन जग झूमे
तुम बोलो जैसे वैसे ही जग घूमे
कर दो कुछ ऐसा कि प्रेम की पवन चले
हे मनमोहन आओ तुम्हारा स्वागत है...

फिर से मित्र सखाओं का तुम नारा दो
व्याप्त अनैतिकताओं को घाव करारा दो
दिखलाओ लीला ऐसी कि पाप मिटे
है लीलाधर आओ तुम्हारा स्वागत है...

दो गीता का ज्ञान सभी को नई तरह से
खोलो अंतर्मन के द्वार सभी के नई तरह से
काम क्रोध मद मोह सभी की अति रोको
हे योगिराज - हे कृष्ण तुम्हारा स्वागत है
हे 'सबसे चर्चित मित्र'तुम्हारा स्वागत है...

- विशाल चर्चित

Friday, August 28, 2015

ये राखी के धागे.....



क्या अजीब खेल हैं ज़िंदगी के
कि एक ही कोख से जन्म लेते हैं
वर्षों एक छत के नीचे साथ रहते हैं
लड़ते हैं - झगड़ते हैं - रूठते हैं - मनाते हैं
समझते हैं - समझाते हैं...
ढेर सारी चीजों पर -
ढेर सारी बातें करते हैं
हर सुख में - हर दुःख में
एक दूसरे का सहारा बनते हैं,
देखते ही देखते पता ही नहीं चलता
और आता है एक दिन ऐसा भी कि
न चाहते हुए भी बिछड़ जाते हैं हम...
बस रोते - बिलखते लाचार से
हाथ हिलाते रह जाते हैं हम...
अब तो सिर्फ आवाज सुनाई देती है
या वर्षों बाद मिलना हो पाता है...
इस बीच अकेले में हमें जोड़े रखता है
हमारा प्यार - हमारे बचपन की यादें
कुछ परम्पराएं - कुछ संस्कार
और इनकी खुशबू से भीगे धागे,
ये राखी के धागे.....

-विशाल चर्चित

Tuesday, August 25, 2015

झगड़ा धूल ये मत भूल, धूल से गंदे नहीं होते फूल...


















मैं मोनू - तू सोनू
मैं और तू हैं
पक्के दोस्त,
अपना हो गया झगड़ा
वो भी एकदम तगड़ा,
तूने मुझे धकेला
मैं कैसे गिरता अकेला,
मैंने फेका कीचड़
तूने बोला फटीचर,
तूने मारा घूंसा
मैंने मारा ठूंसा,
तो अब तू
क्यों है गुस्सा,
गुस्सा थूक
अब मत चूक,
मुझको लग गई
जोर की भूख,
मेरे यार
तू होशियार,
ले के आ जा
पराठे चार,
मिल के खायेंगे
उधम मचायेंगे,
जलनेवाले
जल जल जायेंगे,
झगड़ा धूल
ये मत भूल,
धूल से गंदे
नहीं होते फूल...

- विशाल चर्चित

Sunday, August 02, 2015

गर दोस्तों का साथ रहे - जिन्दगी जिन्दाबाद रहे...






















एकाएक हो जाती हैं
हमारी कई आंखें
हमारे कई हाथ,
बढ़ जाती है ताकत
बढ़ जाता है कई गुना
हमारा हौसला,
हो जाती है एकाएक
बहुत दूर तक हमारी
हमारी पहुंच,
इसतरह आसान हो जाते हैं
हमारे तमाम काम
और बहुत आसान सी
हो जाती है जिन्दगी हमारी,
जब हो जाते हैं
कुछ अच्छे दोस्त हमारे साथ...
हम न होकर भी हो जाते हैं
डॉक्टर-इंजीनियर-मैनेजर
वकील-पुलिस ऑफीसर
या फिर राजनीतिज्ञ,
क्योंकि हमारे दोस्त हैं न ये सब?!
कोई भी दिक्कत हो
कोई भी अड़चन हो,
बस दोस्त को फोन घुमाना है
कोई भी - कैसी भी समस्या हो
समाधान फटाफट हो जाना है...

गर दोस्तों का साथ रहे
जिन्दगी जिन्दाबाद रहे...

- विशाल चर्चित

Wednesday, July 29, 2015

बच्चा-बच्चा तुम्हें याद करता रहे...





जब जुड़े विज्ञान से तो
अग्नि मिसाइल बना डाली,
जब बच्चों को पढ़ाने चले तो
जोड़ दिये कई नये अध्याय...
जब जुड़े देश की सेवा से तो
कायम कर दीं कई नई मिसालें,
बन बैठे जनता के राष्ट्र्पति
और आपसे सम्मानित होने लगे
देश के सारे के सारे सम्मान...
बहुत खूबसूरत नहीं थे तो क्या
खूबियां इतनी पैदा की कि
खूबसूरती खुद तरसा करे
आपके करीब आने के लिये,
व्यवहार इतना सीधा और सरल
कि बचपना देखे सपने
आप जैसा बन पाने के लिये...
सच में आप थे हैं और रहेंगे
एक ऐसे खूबसूरत कलाम
जिसको गर्व से गुनगुना रहा है
और गुनगुनाता रहेगा पूरा देश
आपको दिल से करते हुए सलाम...
आपकी शान में एक शेर कि -

एक ऐसी कहानी से तुम बन गये
बच्चा-बच्चा तुम्हें याद करता रहे

हार्दिक नमन एवं श्रद्धांजलि के साथ

- विशाल चर्चित

Sunday, May 10, 2015

माँ........... नहीं समझ आई ये दुनिया मुझे...


माँ...........
नहीं समझ आई ये दुनिया मुझे
नहीं समझ आये ये रिश्ते मुझे
नहीं समझ आई ये ज़िन्दगी की
कभी धूप और कभी छाँव,
समझ आई तो सिर्फ एक तू
तेरा प्यार - तेरी ममता और
तेरे आँचल की सुहानी छाँव......
समझ आया तो तेरे हाथों का
वो प्यारा स्पर्श - वो सहलाना,
मुझे हर अच्छा - बुरा समझाना
गुस्से में बस यूँ ही मुझे
न जाने किन किन नामों से बुलाना.....
आज हूँ बहुत दूर तुझसे फिर भी
फोन पर तेरी एक आवाज़ ही
बढ़ा देती मेरा उत्साह - मेरी ताकत,
इतनी मुश्किलों भरी है ज़िन्दगी
फिर भी जीने की एक चाहत......
सच कहूं, बहुत डर जाता हूँ मैं
अगर देख लूं कोई ऐसा सपना कि
तू नहीं है अब यहाँ मेरे साथ,
चली गयी है दूर - बहुत दूर मुझसे
शायद कहीं किसी दूसरी दुनिया में,
कांप जाता हूँ मैं सिर से पैर तक
कांप जाता हूँ सिर्फ इस एक ख़याल भर से ही
और नहीं हो पाता सामान्य तब तक
तब तक जब तक कि नहीं हो जाए तुमसे बात
नहीं हो जाए पक्का यकीन - पक्की तसल्ली कि
तुम हो एकदम ठीक - स्वस्थ और खुश......
तो बस यूँ ही हमेशा खुश दिखना
हमेशा खूब चुस्त - दुरुस्त तंदरुस्त दिखना,
वर्ना मेरी ठन जायेगी ईश्वर से -उसकी सत्ता से
क्योंकि मुझे नहीं मालूम कि
ईश्वर क्या है - कौन है - कैसा है
जब से आँख खुली है तुझे ही देखा है
तुझे ही जाना है - तुझे समझा है बस
तू ही है मेरे लिए ईश्वर - उसका हर रूप
मतलब तू नहीं तो ईश्वर भी नहीं.........

- VISHAAL CHARCHCHIT

माँ, जहां ख़त्म हो जाता है अल्फाजों का हर दायरा...

माँ,
जहां ख़त्म हो जाता है
अल्फाजों का हर दायरा,
नहीं हो पाते बयाँ
वो सारे जज़्बात जो
महसूस करता है हमारा दिल,
और आती हैं जेहन में
एक साथ वो तमाम बातें....
छाँव कितनी भी घनी हो
नहीं हो सकती सुहानी
माँ के आँचल से ज्यादा....
रिश्ता कितना भी गहरा हो
नहीं हो सकता है कभी
एक माँ के रिश्ते से गहरा...
क्योंकि रिश्ते तो क्या
इस जहां से ही हमारा
परिचय कराती है एक माँ ही,
हर एहसास - हर अलफ़ाज़ का
मतलब भी बताती है एक माँ ही...
इसलिए माँ तुम्हारे बारे में
क्या कह सकते हैं हम
कुछ नहीं - कुछ नहीं - कुछ नहीं !!!
- VISHAAL CHARCHCHIT

Friday, May 08, 2015

तब मौन हो जाता है अत्यंत आवश्यक...

मौन हो जाता है
अत्यंत आवश्यक,
तब -
जब हो गया हो
बहुत अधिक
कहना या सुनना,
जब लगने लगे कि 
अब नहीं चाहते लोग
आपकी सुनना...
जब नहीं चल रहा हो
किसी पर अपना बस,
प्रतिकूल परिस्थितियों
के कारण जब
नहीं रह जाये
जीवन में कोई रस...
जब व्यथित हो चला 
हो आपका मन,
जब नीरसता से भरा 
हो वातावरण...
तब हो जायें शांत
तब हो जायें स्थिर
तब हो जायें उदासीन
तब हो जाये मौन...
क्योंकि -
मौन आत्मचिन्तन है
मौन आत्ममंथन है
मौन है परिमार्जन ह्रुदय का
मौन आत्मा का स्पंदन है...

- विशाल चर्चित

Sunday, April 26, 2015

रहम करो - रहम करो त्राहि माम - त्राहि माम...


सभी भूकम्प पीड़ितों के प्रति हार्दिक संवेदना
एवं प्रभावित क्षेत्र के सभी लोगों के लिये
ईश्वर से प्रार्थना के साथ...एक भाव,
जो अनायास ही आ गया मन में...

कभी भूकंप - कभी बाढ़
कभी सूखा - कभी सुनामी
कभी दंगे - कभी दुर्घटना,
जैसे इस बहाने ईश्वर
चाहता हो ये कहना कि
'भय बिनु होय न प्रीति...'
क्योंकि अगर न हों ये आपदायें
मनुष्य का शक्तिशाली मस्तिष्क
कहां मानेगा उसकी सत्ता को
कहां स्वीकारेगा उसकी प्रभुता को...
होती तो है पूरी कोशिश
होता तो है पूरा प्रयास कि
खोज ली जाये पूरी तकनीक
निचोड़ लिया जाये पूरा विज्ञान
सुलझा ली जायें सारी समस्यायें
जीत ली जायें सारी दिशायें
जीत लिया जाये पूरा ब्रह्माण्ड
गढ़ लिया जाये
अपने जैसा दूसरा मानव,
गढ़ दिया जाये
साक्षात ईश्वर को भी
गॉड पार्टिकल के रूप में...
लेकिन तभी लगता है एक झटका
और धरी की धरी रह जाती है
सारी तकनीक - सारा विज्ञान
सारी की सारी विद्यायें,
तब निकलता है मुँह से
'हे ईश्वर - या ख़ुदा - ओ गॉड
या फिर हे राम
रहम करो - रहम करो
त्राहि माम - त्राहि माम...'

- विशाल चर्चित

Friday, March 13, 2015

बड़ी गहरी आती है नींद....

बड़ी गहरी आती है नींद
जब पता हो कि कोई है
समय से जगा देने वाला,
बढ़ जाता है खाने का जायका
'आपको भूख लगी होगी'
जब कोई हो ये बता देने वाला...

अच्छा लगता है भूल जाना
तमाम चीजों का भी 
जब कोई हो हमारी 
हर चीज को याद रखनेवाला,
हो ही जाते हैं थोड़े से लापरवाह हम 
जब कोई हो हमारी फिक्र करने वाला...

कई बार यूं ही
मन करता है लड़खड़ाने का
जब हो कोई संभाललेने वाला,
आ ही जाती है मुसीबतों पर भी हंसी
जब पता हो कि कोई है
हमें उनसे भी निकाल लेनेवाला...

बिना बात के भी आ जाता है रोना
जब कोई हो आंसू पोछनेवाला,
दिमाग हो जाता है शून्य सा
जब कोई हो हमसे भी ज्यादा
हमारे बारे में सोचनेवाला...

बदल जाते हैं जिन्दगी के मायने ही
जब कोई हो हमारे लिये ही
चुपचाप जिये जानेवाला,
थोड़ा तो गुरूर आ ही जाता है 
जब कोई हो अपना सबकुछ
हम पर निसार किये जाने वाला...

- विशाल चर्चित

Sunday, February 01, 2015

तय करनी पड़ती हैं प्राथमिकतायें....

तय करनी पड़ती हैं
प्राथमिकतायें,
जब व्यस्त हों आप
एक साथ कई चीजों में...
बेहतर तो यही हो कि
हम करें एक समय में
एक कार्य को ही,
ताकि दे सकें पूरा ध्यान
बनी रहे पूरी तन्मयता...
लेकिन -
कहां हो पाता है ऐसा
आज के प्रतिद्वंद्वी वातावरण में,
जबकि व्यापक एवं विस्तृत हो चला है
हर कर्मठ एवं महात्वाकांक्षी 
व्यक्ति का कार्यक्षेत्र,
इतना कि कम पड़ रहे हैं अब
दिन - रात के चौबीस घंटे भी...
एक - एक चीज के लिये
करना पड़ रहा है 
पहले से अधिक मेहनत अब,
करनी पड़ रही है
पहले से अधिक प्रतियोगिता अब,
हर कार्य हो सुनियोजित
हर प्रयास हो योजनाबद्ध
सदा हो बस लक्ष्य पर निगाह
सदा रहना पड़ता है चौकन्ना...
क्योंकि -
बढ़ गये हैं लोग
बढ़ गई है आवश्यकतायें
बड़े हो गये हैं सपने
बड़ा हो गया है दिमाग...
और -
घट गई है भावुकता
घट गया है ईमान
घट गई है मानवता
घट गई है नैतिकता...
इसलिये -
रह गया है सिर्फ दिखावा
रह गई है सिर्फ औपचारिकतायें
रह गया है सिर्फ जोड़ - तोड़
रह गया है सिर्फ स्वार्थ,
कुछ अपवादों को छोड़कर...

- विशाल चर्चित

Monday, January 12, 2015

उठो - खड़े होओ - आगे बढ़ो

हां, बिलकुल सही है
चोट लग जाने के बाद
सोच समझकर चलना,
दूध से जल जाने के बाद
छाछ भी फूंक - फूंक कर पीना...
लेकिन वो रास्ता ही छोड़ देना
जहां लगी हो चोट?
पीना ही छोड़ देना
दूध ही नहीं छाछ भी?
फिर कैसे जियोगे भला
सबकुछ छोड़ कर जिन्दगी?
चोट लगनी है तो 
लग जायेगी कहीं भी - कैसे भी,
जलना है तो जल जाओगे
कहीं भी - कभी भी - कैसे भी,
चाहे जितने रहो सतर्क
चाहे जितने रहो चौकन्ने...
तो क्या बहुत ज्यादा सोचना
क्या बहुत ज्यादा विचारना
क्या बहुत ज्यादा पछताना
क्या बहुत ज्यादा दुखी होना
क्या बहुत ज्यादा उदास होना...
बड़े से बड़े हादसों के बावजूद
जिन्दगी की रफ्तार
हो सकता है कि थोड़ी धीमी हो जाये
जिन्दगी खुद थोड़ी लड़खड़ा जाये
पर रुकती कभी नहीं,
क्योंकि अगर रुक गई तो फिर
जिन्दगी जिन्दगी नहीं रहती...
इसलिये उठो - 
खड़े होओ - आगे बढ़ो
एक सुनहरा कल बेताब है
तमाम खुशियां - तमाम सुकून
तमाम जश्न और तमाम मुस्कुराहटें,
तुम्हारे लिये साथ लिये...

- विशाल चर्चित