Tuesday, August 25, 2015

झगड़ा धूल ये मत भूल, धूल से गंदे नहीं होते फूल...


















मैं मोनू - तू सोनू
मैं और तू हैं
पक्के दोस्त,
अपना हो गया झगड़ा
वो भी एकदम तगड़ा,
तूने मुझे धकेला
मैं कैसे गिरता अकेला,
मैंने फेका कीचड़
तूने बोला फटीचर,
तूने मारा घूंसा
मैंने मारा ठूंसा,
तो अब तू
क्यों है गुस्सा,
गुस्सा थूक
अब मत चूक,
मुझको लग गई
जोर की भूख,
मेरे यार
तू होशियार,
ले के आ जा
पराठे चार,
मिल के खायेंगे
उधम मचायेंगे,
जलनेवाले
जल जल जायेंगे,
झगड़ा धूल
ये मत भूल,
धूल से गंदे
नहीं होते फूल...

- विशाल चर्चित

4 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल बृहस्पतिवार (27-08-2015) को "धूल से गंदे नहीं होते फूल" (चर्चा अंक-2080) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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    1. सर जी,
      साहित्य के प्रति आपकी निष्ठा - आपके समर्पण - आपकी निस्पक्षता को हृदय से प्रणाम है... मैं साहित्य से जुड़े जितने भी लोगों को जानता हूं, आप जैसी सच्ची लगन किसी में नहीं दिखी.... मेरी हार्दिक इच्छा है कि देश साहित्यिक बागडोर आपके हाथों में हो... आपके सुखी - स्वस्थ एवं सुदीर्घ जीवन की कामना सहित....

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  2. बहुत सुंदर,बातों-बातों में.

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    1. बहुत - बहुत शुक्रिया जी !!!

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