Saturday, September 10, 2011

ये आशिकी का भूत साला....

ये आशिकी का भूत साला सिर पे चढ़के बोलता
और माशूक है कि दिल का दरवाज़ा ही नहीं खोलता....
रोज़ लगते चक्कर उसकी गली के यारों
फिर भी एक कुत्ता देखते ही हमको भौंकता......
सपने में भी आती है तो बाप और भाई के साथ
हम नींद में चौंक जाते हैं जैसे बच्चा चौंकता....
भूल से एक दोस्त से कर बैठे हैं ज़िक्र हम
वो भी साला घाव पे हमेशा नीबू ही है निचोड़ता....

3 comments:

  1. बाप और भाई के साथ ||
    वो भी साला घाव पे हमेशा नीबू ही है निचोड़ता ||

    बढ़िया प्रस्तुति |
    बधाई ||

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  2. आप एक बहुत अच्छे कवि हैं। हास्य - व्यंग्य आपकी रचनाओं में कूट- कूट कर भरा हुआ है। सितंबर मास की आपकी रचनाओ को पढ़ा। षीघ्र हीं षेड्ढ रचनाओं को पढ़ने के लिए पधारूंगा। आप माला फुल लेकर तैयार रहीएगा।

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