न जाने कौन से वो दिल हैं जो
दिलों के चीथड़े उड़ाया करते हैं,
इधर उज़ड़ती हैं जिंदगियां
उधर ठहाके लगाया करते हैं....
वो आंखें हैं कि शीशा हैं
कि उनमें मर चुका पानी,
इधर होता है अँधेरा
उधर वो जश्न मनाया करते हैं...
न जाने क्या वो खाते हैं
न जाने क्या वो पाते हैं
न जाने कौन सी दुनिया से
वो आया - जाया करते हैं...
मिले जो ईश्वर तो उससे
होगा ये सवाल अपना
कि पैदा होते ही ये दरिन्दे
क्यों नहीं मर जाया करते हैं...
गुरुवार, जुलाई 14, 2011
बुधवार, जुलाई 13, 2011
आज का युवा बहुत व्यस्त...
आज का युवा बहुत व्यस्त, अपने में मस्त
जब देखो एक साथ दो-चार काम निपटा रहा होता है,
सुबह-सुबह टॉयलेट में, मुंह में टूथ ब्रश
हाथों में लैपटॉप, कान में मोबाइल फोन
मतलब यहाँ भी ऑफिस जैसा माहौल
नज़र आ रहा होता है....
हर समय दो - दो सिम कार्ड वाले
दो मोबाइल रखता है अपने साथ,
मतलब एक ही समय में मॉम - डैड
बॉस-फ्रेंड-गर्ल फ्रेंड सबसे बतिया रहा होता है....
ऑफिस में कंप्यूटर पर काम, इन्टरनेट पर
फेसबूक-ट्विट्टर-याहू-जीमेल सब ऑन,
ऊपर से घनघनाता फ़ोन, चिल्लाता बॉस
फिर भी बेचारा मुस्कुरा रहा होता है...
शाम को घर में खाने के समय भी
एक हाथ में चम्मच, एक में टीवी का रिमोट
सामने टीवी पर एक न्यूज़ - एक फिल्म
एक कॉमेडी - एक म्यूजिक शो, एक साथ
इन सबका लुत्फ़ उठा रहा होता है...
रात को सपने में भी कुछ घंटे गर्ल फ्रेंड
कुछ फ्रेंड, थोड़ी देर देश में - थोड़ी देर विदेश में
और कभी कभार दूसरी दुनिया के लोगों से भी
अपनी जान - पहचान बढ़ा रहा होता है...
और 'चर्चित' एक तुम हो कि
रह गए वहीँ के वहीँ, ढीले-ढाले
एक समय में एक काम करने वाले,
अरे उठो - जागो, कुछ सोचो कि
जब तुम कविताबाजी कर रहे होते हो
कल का लड़का करोड़ों कमा रहा होता है...
जब देखो एक साथ दो-चार काम निपटा रहा होता है,
सुबह-सुबह टॉयलेट में, मुंह में टूथ ब्रश
हाथों में लैपटॉप, कान में मोबाइल फोन
मतलब यहाँ भी ऑफिस जैसा माहौल
नज़र आ रहा होता है....
हर समय दो - दो सिम कार्ड वाले
दो मोबाइल रखता है अपने साथ,
मतलब एक ही समय में मॉम - डैड
बॉस-फ्रेंड-गर्ल फ्रेंड सबसे बतिया रहा होता है....
ऑफिस में कंप्यूटर पर काम, इन्टरनेट पर
फेसबूक-ट्विट्टर-याहू-जीमेल सब ऑन,
ऊपर से घनघनाता फ़ोन, चिल्लाता बॉस
फिर भी बेचारा मुस्कुरा रहा होता है...
शाम को घर में खाने के समय भी
एक हाथ में चम्मच, एक में टीवी का रिमोट
सामने टीवी पर एक न्यूज़ - एक फिल्म
एक कॉमेडी - एक म्यूजिक शो, एक साथ
इन सबका लुत्फ़ उठा रहा होता है...
रात को सपने में भी कुछ घंटे गर्ल फ्रेंड
कुछ फ्रेंड, थोड़ी देर देश में - थोड़ी देर विदेश में
और कभी कभार दूसरी दुनिया के लोगों से भी
अपनी जान - पहचान बढ़ा रहा होता है...
और 'चर्चित' एक तुम हो कि
रह गए वहीँ के वहीँ, ढीले-ढाले
एक समय में एक काम करने वाले,
अरे उठो - जागो, कुछ सोचो कि
जब तुम कविताबाजी कर रहे होते हो
कल का लड़का करोड़ों कमा रहा होता है...
मंगलवार, जुलाई 12, 2011
इन शहरी बिल्डरों से तो अच्छा था वीरप्पन...
इन शहरी बिल्डरों से तो अच्छा था वीरप्पन
चन्दन की तस्करी करता था, पर हरा भरा था जंगल,
हरा भरा था जंगल, जंगल में था मंगल
यहाँ शहर में मची हुई है देखो बुल्डोज़री दंगल...
रोज़ कट रहे पेड़, लद रही बिल्डिंगों पे बिल्डिंगें
बढ़ रही गर्मी और आग, जहाँ देखो वहां दमकल...
सिकुड़ती सर्दियाँ, फैलते गर्मी के मौसम
ज़रूरी हो गए अब पाखानों में भी एसी या कूलर..
एसी या कूलर, इनसे गड़बड़ाता वातावरण
पिघलती बर्फ पहाड़ों पर, बढ़ता सागरी जलस्तर...
बढ़ता सागरी जलस्तर, सपनों में भी आता सुनामी
चलों 'चर्चित' बेटा बना लें अभी से एवरेस्ट पर घर....
सोमवार, जुलाई 11, 2011
हर किसी का अपना तरीका है ज़िन्दगी का ...
हर किसी का अपना
तरीका है ज़िन्दगी का
हर किसी का अपना
अंदाज़ अलग है...
फिर क्या गलत
और क्या सही
ये बात अलग है...
लोग अक्सर समझते हैं कि
मदहोश करती है शराब,
फिर कोई पी के होश में आये
ये बात अलग है...
नालियों को अक्सर
जोड़ा जाता है गन्दगी से,
कोई समझे उसी को बिस्तर
ये बात अलग है...
कहते हैं धुम्रपान से
ख़राब होते हैं फेफड़े,
किसी का खुलता है दिमाग इसी से
ये बात अलग है...
कोई उल्टी-सीधी हरकतें करे
तो कहती है दुनिया पागल,
अब वो दुनिया को पागल समझे
ये बात अलग है...
लोग सुनते तो हैं सबकी
पर करते हैं अपने मन की
हम फिर भी समझाए जाते हैं
ये बात अलग है....
तरीका है ज़िन्दगी का
हर किसी का अपना
अंदाज़ अलग है...
फिर क्या गलत
और क्या सही
ये बात अलग है...
लोग अक्सर समझते हैं कि
मदहोश करती है शराब,
फिर कोई पी के होश में आये
ये बात अलग है...
नालियों को अक्सर
जोड़ा जाता है गन्दगी से,
कोई समझे उसी को बिस्तर
ये बात अलग है...
कहते हैं धुम्रपान से
ख़राब होते हैं फेफड़े,
किसी का खुलता है दिमाग इसी से
ये बात अलग है...
कोई उल्टी-सीधी हरकतें करे
तो कहती है दुनिया पागल,
अब वो दुनिया को पागल समझे
ये बात अलग है...
लोग सुनते तो हैं सबकी
पर करते हैं अपने मन की
हम फिर भी समझाए जाते हैं
ये बात अलग है....
रविवार, जुलाई 10, 2011
रोओ खूब रोओ...
वक़्त वो मरहम है
जो हर घाव भर देता है,
बुझे से बुझे चेहरों में भी
मुस्कान भर देता है...
बस थोडा सा सब्र
थोड़ी उम्मीद होनी चाहिए
आंसुओं की जगह आँखों में
एक हसीं ख्वाब जगह ले लेता है...
ये दुनिया अजीब है
यहाँ किसी के आने - जाने से
फर्क नहीं पड़ता है,
कोई एक ग़म देता है तो
कोई हज़ार ख़ुशी दे देता है...
रोना दवा या मकसद नहीं
गुबार होना चाहिए,
जो जितनी ज़ल्दी निकल जाये
इंसान उतनी ज़ल्दी हल्का हो लेता है...
तो रोओ खूब रोओ
क्योंकि बहुत ज्यादा रोना
बाद में बहुत ज्यादा मज़ा देता है..
जो हर घाव भर देता है,
बुझे से बुझे चेहरों में भी
मुस्कान भर देता है...
बस थोडा सा सब्र
थोड़ी उम्मीद होनी चाहिए
आंसुओं की जगह आँखों में
एक हसीं ख्वाब जगह ले लेता है...
ये दुनिया अजीब है
यहाँ किसी के आने - जाने से
फर्क नहीं पड़ता है,
कोई एक ग़म देता है तो
कोई हज़ार ख़ुशी दे देता है...
रोना दवा या मकसद नहीं
गुबार होना चाहिए,
जो जितनी ज़ल्दी निकल जाये
इंसान उतनी ज़ल्दी हल्का हो लेता है...
तो रोओ खूब रोओ
क्योंकि बहुत ज्यादा रोना
बाद में बहुत ज्यादा मज़ा देता है..
माँ की ममता...
कितने आये - कितने गए
कितनों ने क्या-क्या लिख डाला,
पर माँ की ममता को शब्दों से
कोई भी बाँध नहीं पाया...
जिस तरह ईश्वर के बारे में
लोग क्या - क्या उपमाएं देते हैं,
पर कहाँ आज तक कोई भी
उसकी नाप है ले पाया...
कितनों ने क्या-क्या लिख डाला,
पर माँ की ममता को शब्दों से
कोई भी बाँध नहीं पाया...
जिस तरह ईश्वर के बारे में
लोग क्या - क्या उपमाएं देते हैं,
पर कहाँ आज तक कोई भी
उसकी नाप है ले पाया...
कोई साथ हो तो रास्ता हसीन हो जाता है...
कोई साथ हो तो रास्ता
हसीन हो जाता है
मोड़ खुद-ब-खुद
हमारे साथ मुड जाता है,
बातों में पता नहीं चलता
कब आ गयी मंजिल
ज़िन्दगी का एक लम्बा सफ़र
यूँ आसान हो जाता है....
मोड़ खुद-ब-खुद
हमारे साथ मुड जाता है,
बातों में पता नहीं चलता
कब आ गयी मंजिल
ज़िन्दगी का एक लम्बा सफ़र
यूँ आसान हो जाता है....
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