Saturday, March 17, 2012

ये मेरे कुछ शेर.....

या सुलगना है तो सुलगो या बनो दिल का चिराग
हमने तो दिल का अँधेरा छोड़ रखा है यूं ही......
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मुहब्बत पार करती है जब अपनी सरहदें सारी
तो होता है हमारा दिल एक बच्चे की मां का दिल
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शरारत - दिल्लगी सबसे बहुत अच्छी नहीं होती
यहाँ जालिम जमाने में सभी ' विशाल ' नहीं होते
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देख लो दिल हारना तुमको पड़ेगा
एक दिन जिद मारना तुमको पड़ेगा
बस के बाहर होंगी जब बेचैनियाँ
नाम मेरा पुकारना तुमको पड़ेगा....
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ग़र वाकई हमसे मुहब्बत हो गयी
फिर इसतरह दिल्ली - दौलताबाद क्यों ??
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खुदी जीतें - खुदी हारें, खुदी ऐलान करते हैं
मुहब्बत हमसे है लेकिन हमें हैरान करते हैं
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आजकल देर से तुम आते हो
कहाँ-कहाँ बिजलियाँ गिराते हो ?
यूं तो माना नकाब रहता है
मगर नज़रों से तो कहर ढाते हो ? 
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अब भी है वक्त सम्हलो बढ़ा दो कदम
वरना ये ज़िन्दगी पछताने में जायेगी
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मिजाज-ए-रुत तो बदले पर
कोई कोशिश उधर से हो
"मियाँ की दौड़ मस्जिद तक"
से सोचो क्या बदलता है.....
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वो मुझे समझा रहे सलीका-ए-मुहब्बत
खुद जिनको दिल में आना-जाना नहीं आता
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क्या खूब है मुकाम ये भी आशिकी में 'चर्चित'
कोई दिल तुम्हारी खातिर चुपचाप धडके जा रहा
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याद मत दिला मुझे अपनी गली का रास्ता
कह दिया न अब नहीं है तेरा मेरा वास्ता ?!
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फ़िक्र करो तुम कि तुम्हें कौन मिलेगा यहाँ
हम तबीयत से फ़कीर एक दर नहीं तो क्या
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कहने को कह दिया कि याद बहुत करते हैं
लेकिन बात नहीं करते बगल से गुज़रते हैं
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ज़िन्दगी के फलसफे कुछ रास यूं आये हमें
कि दिल हमारा एक हद फलसफा खुद हो गया...
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लगता है मेरे सवालों का जवाब नहीं सूझा
दिल-आशिकी समेट कर आज वो फरार हैं
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पलटकर देखना हमसे न होगा अब तुझे जालिम
बहुत तडपा है दिल तुझसे अरे बेदर्द ओ जालिम
सुकूं जितना है काफी है हमारी ज़िन्दगी में अब
तड़प तू अब कि क्या खोया हमें खो करके ओ जालिम
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बहुत गहरी उदासी है बहुत मायूस लगते हो
हमारी ही तरह दिल से बड़े मशरूफ लगते हो
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बाकी तो इस शहर का मालूम नहीं मुझको
ये दिल तुम्हारी चर्चा हर वक्त किया करता है
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हुश्न समझाने पे जब आये, नज़र कातिल नज़र आये
उठें जब उंगलियाँ उनकी, हमें खंज़र नज़र आयें......
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वादा-ओ-फ़र्ज़ सारे निभाओ मगर फिर भी
कोई जाता है तो जाए बेवफा हो जाए........
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पता है कि तुम चोट खाए हुए हो
बहुतों को तुम आजमाए हुए हो
मगर इतनी नफ़रत भी अच्छी नहीं
कि जमाने से दूरी बनाए हुए हो
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न दूर थे - न दूर हैं - न दूर कभी होंगे
आवाज़ दिल से एक बार देके ज़रा देखो
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मुहब्बत की बैशाखियों पे चलोगे
तो सोचो कि तुम यूं कहाँ तक चलोगे
बहुत मतलबी ज़िन्दगी का सफ़र है
ठोकर लगेगी जो दिल से चलोगे....
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मुहब्बत की कैसी ये लत लग गयी है
कि वो आगे-आगे और हम पीछे-पीछे
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इन आँखों में आंसू क्यों मेरे होते हुए जानां
कौन सा दर्द भारी है मेरे इस प्यार पे जानां
कोई है घाव जो गहरा दिखाओ तो भला मुझको
बना दूं साँसों को मरहम अगर राहत मिले जानां
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सामने हों तो छिड़कते हैं जान हम पर
वर्ना ज़माने से फुरसत ही कहाँ उनको

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4 comments:

  1. शरारत - दिल्लगी सबसे बहुत अच्छी नहीं होती
    यहाँ जालिम जमाने में सभी ' विशाल ' नहीं होते.... UMDA

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