रविवार, मई 13, 2012

माँ...........


माँ..........
नहीं समझ आई ये दुनिया मुझे
    नहीं समझ आये ये रिश्ते मुझे
         नहीं समझ आई ये ज़िन्दगी की
                कभी धूप और कभी छाँव,
                        समझ आई तो सिर्फ एक तू
                              तेरा प्यार - तेरी ममता और 
                                   तेरे आँचल की सुहानी छाँव......
समझ आया तो तेरे हाथों का
    वो प्यारा स्पर्श - वो सहलाना,
         मुझे हर अच्छा - बुरा समझाना
                गुस्से में बस यूँ ही मुझे
                       न जाने किन किन नामों से बुलाना.....
आज हूँ बहुत दूर तुझसे फिर भी
    फोन पर तेरी एक आवाज़ ही 
         बढ़ा देती मेरा उत्साह - मेरी ताकत,
                इतनी मुश्किलों भरी है ज़िन्दगी
                      फिर भी जीने की एक चाहत......
सच कहूं, बहुत डर जाता हूँ मैं
    अगर देख लूं कोई ऐसा सपना कि
           तू नहीं है अब यहाँ मेरे साथ,
                   चली गयी है दूर - बहुत दूर मुझसे
                            शायद कहीं किसी दूसरी दुनिया में......
कांप जाता हूँ मैं सिर से पैर तक
     कांप जाता हूँ सिर्फ इस एक ख़याल भर से ही
            और नहीं हो पाता सामान्य तब तक
                    तब तक जब तक कि नहीं हो जाए तुमसे बात
                            नहीं हो जाए पक्का यकीन - पक्की तसल्ली कि
                                  तुम हो एकदम ठीक - स्वस्थ और खुश......
तो बस यूँ ही हमेशा खुश दिखना
    हमेशा खूब चुस्त - दुरुस्त तंदरुस्त दिखना,
         वर्ना मेरी ठन जायेगी ईश्वर से -उसकी सत्ता से
               क्योंकि मुझे नहीं मालूम कि 
                      ईश्वर क्या है - कौन है - कैसा है
                            जब से आँख खुली है तुझे ही देखा है
                                 तुझे ही जाना है - तुझे समझा है बस
                                      तू ही है मेरे लिए ईश्वर - उसका हर रूप
                                         मतलब तू नहीं तो ईश्वर भी नहीं.........

                                               - VISHAAL CHARCHCHIT

सोमवार, मई 07, 2012

पहली बार वीर रस में थोडा हास्य मिलाकर एक नया प्रयोग किया है......साथ ही वीर रस और देश भक्ति की ज्यादातर रचनाएँ पाकिस्तान और आतंकवाद पर देखने को मिलती हैं.......मैंने चीन को लपेटे में लिया है.......आशा है आप सबको पसंद आएगा मेरा यह प्रयोग............


सोमवार, अप्रैल 16, 2012

नशा सुखद पड़ाव है मंजिल नहीं.....

होता है कभी - कभी कि
जिस तरफ जाना हमारे लिए
होता है नुकसानदायक
होता है कई बार गलत भी
दिल जाता है बार - बार 
अक्सर उधर ही - उसी तरफ....
जैसे कि मना किया जाए अगर
नहीं करना ये काम तुम्हें
ये गलत है - ये पाप है
तो मान लेता है हमारा दिमाग
लेकिन कहाँ मानने वाला है दिल
वो बार - बार जाएगा उसी चीज़ पर....
जानते हैं सभी कि नशा कोई भी हो
होता है बहुत बुरा - बहुत घातक,
जानता है ये बात वो नशेडी भी
जो हो चुका है इसका आदी,
लेकिन जब लगती है तलब
जब करना शुरू करता है दिल जिद
नहीं याद रहता कुछ भी उसे, और -
बढ़ जाते हैं कदम खुद - ब - खुद
उस तरफ....उस नशे की तरफ.....
क्योंकि ये देता है उसके दिल को
एक सुकून - एक राहत और शायद
कुछ पल के लिए एक नयी ज़िन्दगी भी....
कितना अच्छा होता कि अगर
अच्छा होता उसके लिए ये नशा,
कितना अच्छा होता कि हमेशा रहता
ज़िन्दगी में ऐसा ही सुकून और 
हमेशा रहती ऐसी ही राहत,
कुछ ऐसे ही ख्वाहिशें कर रहा होता है 
उस नशेडी का एक बच्चे जैसा दिल,
लेकिन सच्चाई तो फिर सच्चाई है
कि बुरी चीज़ बुरी थी - बुरी है और
हमेशा बुरी ही रहेगी उसके लिए....
इससे जितनी ज़ल्दी उबर जाए उतना अच्छा
क्योंकि ये नशा - ये ख़ुशी - ये सुकून
हो सकता है एक सुखद पड़ाव 
लेकिन ज़िन्दगी के लिए एक मंजिल
कभी नहीं - कभी नहीं - कभी नहीं !!!!

- VISHAAL CHARCHCHIT

बुधवार, अप्रैल 11, 2012

रिश्ता.....

रिश्ता चाहे कोई भी हो
तब तक रहता है अधूरा
जब तक नहीं मिलते दिल से दिल,
जज्बातों से जज़्बात, विचारों से विचार
तरंगों से तरंगें और चाहत से चाहत....
नहीं चल सकता कोई भी रिश्ता
बहुत देर तक एकतरफा
ठीक उसी तरह जिसतरह से
नहीं बज सकती हैं कभी भी
सिर्फ एक हाथ से ताली और
नहीं चल सकती हैं बहुत दूर तक 
सिर्फ एक पहिये पर कोई भी गाडी....
उसने हाथ दिया तो 
तुम्हें भी हाथ बढ़ाना पड़ेगा,
किसी का साथ चाहिए 
तो साथ निभाना पड़ेगा....
किसी से हक़ चाहिए तो
पड़ता है हक़ देना भी,
कभी - कभी पड़ता है सुनाना और
कभी - कभी पड़ता है सुनना भी,
रूठना - मनाना और झगड़ना भी.....
इसके अलावा ज़रूरी है रिश्ते के प्रति 
वफादारी और ज़िम्मेदारी भी,
अब इन्हें निभा सकते हो तो निभाओ
वर्ना अकेले रह जाओ
बस खुद के लिए जीते जाओ....
जहां नहीं होगा कोई रोकनेवाला
नहीं होगा कोई टोकनेवाला
न होगा कोई रूठनेवाला - न मनानेवाला
न अकड़नेवाला - न झगड़नेवाला,
चलाओ अपनी मनमानी और 
जब तक चाहो जियो अपने तरीके से....
लेकिन कब तक ?
कभी तो सताएगा अकेलापन?
कभी तो कमजोर होगी ताकत?
कभी तो लड़खडायेंगे तुम्हारे कदम?
याद रखो जश्न मनाओ तो 
साथ देने वाले बहुत मिल जाते हैं,
पेट भरा हो तो खिलानेवाले बहुत मिल जाते हैं
सुख में साथ निभानेवाले बहुत मिल जाते हैं
लेकिन दुःख की घडी में - ज़रुरत हो तो
याद आता है कोई अपना ही और
काम भी आता है कोई अपना ही.....
ये बात एक पत्थर की लकीर है
जब चाहो आजमाना, ताकि -
कभी - किसी मोड़ पर तुम्हें 
न पड़े हाथ मलना - न पड़े पछताना....

- VISHAAL CHARCHCHIT