Monday, January 23, 2017

उसकी घड़ी है बहुत बड़ी...


उसकी घड़ी
है बहुत बड़ी
दिखती है थोड़ी सुस्त
पर चलती है लगातार...
उसके कैमरे
छिपे हैं कण - कण में,
रखते हैं नजर
चप्पे - चप्पे पर
बिना रुके - बिना थके...
उसके एक - एक ऐप्स
हैं एकदम मुश्तैद
एकदम सजग
करते रहते हैं अपना काम
चुपचाप, बिना किसी शोर के...
इसलिये उससे चालाकी
उसकी आंख में धूल झोंकना
पड़ता है बहुत महंगा...
उधर उसकी एक कमांड
इधर सबकुछ या
कुछ बहुत खास
हो जाता है 'डिलीट'
यानी साफ...
या होने लगता है
कहीं - कुछ 'हैंग'
यानी चलने लगता है
रुक - रुककर
अटक - अटक कर...
यही है उसका न्याय
यही है उसकी सत्ता,
वो है हर समय - हर जगह
क्या हुआ जो नहीं है दिखता...

- विशाल चर्चित

4 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (24-01-2017) को "होने लगे बबाल" (चर्चा अंक-2584) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    मकर संक्रान्ति की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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