रविवार, जून 26, 2016

ईश्वर देखो बस्ता लेकर...


सारे कहते बच्चे ईश्वर
ईश्वर देखो बस्ता लेकर,
जाने की तैयारी में है
विद्यालय मुस्कान है लेकर...
नन्हे-नन्हे हाथों में अब
नन्ही-नन्ही पुस्तक होगी,
नन्हे-नन्हे स्लेट चॉक से
प्यारी-प्यारी बातें होंगी...
कख एबीसीडी होगी
मां मां पापा दादा नाना,
आड़े टेढ़े नक्शे होंगे
और साथ में गाना वाना...
मानो सब मामूली बातें
मानो तो आध्यात्म है इसमें,
'चर्चित'को तो दिखता अक्सर
ईश्वर खुद साक्षात है इसमें...

- विशाल चर्चित

मंगलवार, मार्च 08, 2016

महिला दिवस पर जीवनसंगिनी - अर्धांगिनी की शान में एक रचना...

जीवनसंगिनी...
ये एक शब्द मात्र नहीं
बल्कि एक पूरा संसार है
खुशियों का - खुशबुओं का
एहसासों का - मिठासों का
रिश्तों का - नातों का....
जीवनसंगिनी...
एक संगी - एक साथी ही नहीं
बल्कि एक हिस्सा है
हर सुख - दुःख, हर धर्म - कर्म का
हर बात का - हर विचार का,
हर स्वभाव - हर व्यवहार का...
लेकिन ये सब तब है जबकि
हम इन सब चीज़ों को
मानें - महसूस करें,
ठीक उस तरह जैसे कि
हम एक मूर्ति को
मानें तो ईश्वर नहीं तो पत्थर...

- विशाल चर्चित

महिला दिवस पर एक खास रचना...

हे नारी तू सागर है...
हे नारी तू सागर है
जहां नदियाँ मिलतीं आकर हैं
पुरुष समझता आधा - पौना
कहे घरेलू गागर है...

जिसने भाँप लिया रत्नों को
तेरे आँचल के साए में,
सही अर्थ में समझो उसका
देवी - देवताओं का घर है...

फ़र्ज़ - धर्म और संस्कार
बचपन से साथ लिए चलती,
इन सीमाओं के बावजूद
उन्नति करती तू अक्सर है...

पुरुष उलझ जाता अक्सर
दुनियादारी के पचड़ों में,
पर तेरे लिए तो घर - परिवार
सारी दुनिया से बढ़कर है...

नौ माह तक अपने खून से
सींच-सींच देती आकार,
फिर सहती पीड़ा अथाह
तब आता बच्चा धरती पर है...

धन्य तेरी ये सहनशीलता
ऋणी तेरा संसार सकल,
हे नारी, तुझको "चर्चित" का
श्रद्धा से भरपूर नमन है...

- विशाल चर्चित

महिला दिवस पर...

रविवार, फ़रवरी 28, 2016

एक बच्चे की भावनाओं को शब्द...


इम्तहान खत्म पर
टेंशनें बनी हुई,
कुछ भी सूझता नहीं
कि क्या करूं 
क्या ना करूं,
पापा मम्मी चाहते
रात-ओ-दिन पढ़ूं-पढ़ूं
लेकिन मेरा मन करे
पेड़ों पर चढ़ूं-चढ़ूं,
दादा-दादी सबसे अच्छे
जो कि हरदम चाहते
मैं ये करूं या वो करूं
पर हमेशा उनको मैं
खुश ही खुश दिखूं-दिखूं !!!

- विशाल चर्चित

बुधवार, फ़रवरी 24, 2016

मानो तो मामूली सिक्का हो जाता है हजारों का...


जिधर देखो उधर
है दुख ही दुख,
जिसे देखो वही
है दुखी-है निराश,
क्योंकि उन्हें
नहीं आता सुखी होना,
उन्हें लगता है कि
गाड़ी-बंगला और
करोड़ों की कमाई को ही
कहते हैं सुखी होना...
लेकिन यदि ऐसा होता तो
नहीं दिखती मुस्कान कभी
किसी भी गरीब के चेहरे पर,
नहीं दिखते आंसू कभी
किसी अमीर के चेहरे पर...
लोग दुखी हैं क्योंकि
उनको चाहिये सब कुछ
अपनी ही पसंद का
अपने ही हिसाब से,
उससे कम पर तो
नहीं होना है कभी खुश
नहीं होना है कभी संतुष्ट...
सब कुछ छीन लेना है
सब कुछ झपट लेना है
सब कुछ हथिया लेना है,
ईश्वर-खुदा-गॉड या ऊपरवाला 
तो जैसे है सिर्फ 
आदेश सुनने के लिये ही,
ये आदेश होता है
पूजा के रूप में या
इबादत के रूप में
प्रार्थना के रूप में...
यदि हो गया अपने मन का
तो खुश कि देखा?
मैंने कर दिखाया न?!
मैं ये - मैं वो...
और जब नहीं होता
अपने मन का तब
शुरू होता है रोना
दूसरों की गलती पर
अपने भाग्य पर
या फिर ईश्वर पर...
लो सुनो एक उपाय
करके देखो एक प्रयोग
सुखी जीवन के लिये
शांतिमय हर पल के लिये
हमेशा मुस्कुराने के लिये...
सच में स्वीकार लो
ईश्वर की सत्ता को,
सीख लो स्वीकारना
अपनी हार को,
मान लो कि
तुम्हें कुछ नहीं है पता,
मान लो कि 
नहीं है कुछ भी 
तुम्हारे हाथ में और
छोड़ दो तर्क करना...
फिर करो महसूस
ईश्वर को-प्रकृति को
अपने भाग्य को
सुख को-सुकून को...

सार ये है कि -

सुख-दुःख है सब झूठी बातें
सारा खेल विचारों का,
मानो तो मामूली सिक्का
हो जाता है हजारों का...

- विशाल चर्चित