शुक्रवार, मई 08, 2015

तब मौन हो जाता है अत्यंत आवश्यक...

मौन हो जाता है
अत्यंत आवश्यक,
तब -
जब हो गया हो
बहुत अधिक
कहना या सुनना,
जब लगने लगे कि 
अब नहीं चाहते लोग
आपकी सुनना...
जब नहीं चल रहा हो
किसी पर अपना बस,
प्रतिकूल परिस्थितियों
के कारण जब
नहीं रह जाये
जीवन में कोई रस...
जब व्यथित हो चला 
हो आपका मन,
जब नीरसता से भरा 
हो वातावरण...
तब हो जायें शांत
तब हो जायें स्थिर
तब हो जायें उदासीन
तब हो जाये मौन...
क्योंकि -
मौन आत्मचिन्तन है
मौन आत्ममंथन है
मौन है परिमार्जन ह्रुदय का
मौन आत्मा का स्पंदन है...

- विशाल चर्चित

रविवार, अप्रैल 26, 2015

रहम करो - रहम करो त्राहि माम - त्राहि माम...


सभी भूकम्प पीड़ितों के प्रति हार्दिक संवेदना
एवं प्रभावित क्षेत्र के सभी लोगों के लिये
ईश्वर से प्रार्थना के साथ...एक भाव,
जो अनायास ही आ गया मन में...

कभी भूकंप - कभी बाढ़
कभी सूखा - कभी सुनामी
कभी दंगे - कभी दुर्घटना,
जैसे इस बहाने ईश्वर
चाहता हो ये कहना कि
'भय बिनु होय न प्रीति...'
क्योंकि अगर न हों ये आपदायें
मनुष्य का शक्तिशाली मस्तिष्क
कहां मानेगा उसकी सत्ता को
कहां स्वीकारेगा उसकी प्रभुता को...
होती तो है पूरी कोशिश
होता तो है पूरा प्रयास कि
खोज ली जाये पूरी तकनीक
निचोड़ लिया जाये पूरा विज्ञान
सुलझा ली जायें सारी समस्यायें
जीत ली जायें सारी दिशायें
जीत लिया जाये पूरा ब्रह्माण्ड
गढ़ लिया जाये
अपने जैसा दूसरा मानव,
गढ़ दिया जाये
साक्षात ईश्वर को भी
गॉड पार्टिकल के रूप में...
लेकिन तभी लगता है एक झटका
और धरी की धरी रह जाती है
सारी तकनीक - सारा विज्ञान
सारी की सारी विद्यायें,
तब निकलता है मुँह से
'हे ईश्वर - या ख़ुदा - ओ गॉड
या फिर हे राम
रहम करो - रहम करो
त्राहि माम - त्राहि माम...'

- विशाल चर्चित

शुक्रवार, मार्च 13, 2015

बड़ी गहरी आती है नींद....

बड़ी गहरी आती है नींद
जब पता हो कि कोई है
समय से जगा देने वाला,
बढ़ जाता है खाने का जायका
'आपको भूख लगी होगी'
जब कोई हो ये बता देने वाला...

अच्छा लगता है भूल जाना
तमाम चीजों का भी 
जब कोई हो हमारी 
हर चीज को याद रखनेवाला,
हो ही जाते हैं थोड़े से लापरवाह हम 
जब कोई हो हमारी फिक्र करने वाला...

कई बार यूं ही
मन करता है लड़खड़ाने का
जब हो कोई संभाललेने वाला,
आ ही जाती है मुसीबतों पर भी हंसी
जब पता हो कि कोई है
हमें उनसे भी निकाल लेनेवाला...

बिना बात के भी आ जाता है रोना
जब कोई हो आंसू पोछनेवाला,
दिमाग हो जाता है शून्य सा
जब कोई हो हमसे भी ज्यादा
हमारे बारे में सोचनेवाला...

बदल जाते हैं जिन्दगी के मायने ही
जब कोई हो हमारे लिये ही
चुपचाप जिये जानेवाला,
थोड़ा तो गुरूर आ ही जाता है 
जब कोई हो अपना सबकुछ
हम पर निसार किये जाने वाला...

- विशाल चर्चित

रविवार, फ़रवरी 01, 2015

तय करनी पड़ती हैं प्राथमिकतायें....

तय करनी पड़ती हैं
प्राथमिकतायें,
जब व्यस्त हों आप
एक साथ कई चीजों में...
बेहतर तो यही हो कि
हम करें एक समय में
एक कार्य को ही,
ताकि दे सकें पूरा ध्यान
बनी रहे पूरी तन्मयता...
लेकिन -
कहां हो पाता है ऐसा
आज के प्रतिद्वंद्वी वातावरण में,
जबकि व्यापक एवं विस्तृत हो चला है
हर कर्मठ एवं महात्वाकांक्षी 
व्यक्ति का कार्यक्षेत्र,
इतना कि कम पड़ रहे हैं अब
दिन - रात के चौबीस घंटे भी...
एक - एक चीज के लिये
करना पड़ रहा है 
पहले से अधिक मेहनत अब,
करनी पड़ रही है
पहले से अधिक प्रतियोगिता अब,
हर कार्य हो सुनियोजित
हर प्रयास हो योजनाबद्ध
सदा हो बस लक्ष्य पर निगाह
सदा रहना पड़ता है चौकन्ना...
क्योंकि -
बढ़ गये हैं लोग
बढ़ गई है आवश्यकतायें
बड़े हो गये हैं सपने
बड़ा हो गया है दिमाग...
और -
घट गई है भावुकता
घट गया है ईमान
घट गई है मानवता
घट गई है नैतिकता...
इसलिये -
रह गया है सिर्फ दिखावा
रह गई है सिर्फ औपचारिकतायें
रह गया है सिर्फ जोड़ - तोड़
रह गया है सिर्फ स्वार्थ,
कुछ अपवादों को छोड़कर...

- विशाल चर्चित

सोमवार, जनवरी 12, 2015

उठो - खड़े होओ - आगे बढ़ो

हां, बिलकुल सही है
चोट लग जाने के बाद
सोच समझकर चलना,
दूध से जल जाने के बाद
छाछ भी फूंक - फूंक कर पीना...
लेकिन वो रास्ता ही छोड़ देना
जहां लगी हो चोट?
पीना ही छोड़ देना
दूध ही नहीं छाछ भी?
फिर कैसे जियोगे भला
सबकुछ छोड़ कर जिन्दगी?
चोट लगनी है तो 
लग जायेगी कहीं भी - कैसे भी,
जलना है तो जल जाओगे
कहीं भी - कभी भी - कैसे भी,
चाहे जितने रहो सतर्क
चाहे जितने रहो चौकन्ने...
तो क्या बहुत ज्यादा सोचना
क्या बहुत ज्यादा विचारना
क्या बहुत ज्यादा पछताना
क्या बहुत ज्यादा दुखी होना
क्या बहुत ज्यादा उदास होना...
बड़े से बड़े हादसों के बावजूद
जिन्दगी की रफ्तार
हो सकता है कि थोड़ी धीमी हो जाये
जिन्दगी खुद थोड़ी लड़खड़ा जाये
पर रुकती कभी नहीं,
क्योंकि अगर रुक गई तो फिर
जिन्दगी जिन्दगी नहीं रहती...
इसलिये उठो - 
खड़े होओ - आगे बढ़ो
एक सुनहरा कल बेताब है
तमाम खुशियां - तमाम सुकून
तमाम जश्न और तमाम मुस्कुराहटें,
तुम्हारे लिये साथ लिये...

- विशाल चर्चित