बुधवार, अप्रैल 11, 2012

यूँ तो हमने....

यूँ तो हमने कोशिशें समझाने की बहुत की
उसको ही दूर जल्दी मगर जाने की बहुत थी

हमने कहा बहुत कुछ उसने सुना बहुत कुछ
उसको बुरी एक आदत भूल जाने की बहुत थी

हम कभी न बदले थे न बदले हैं न बदलेंगे
उसको ही मगर जल्दी बदल जाने की बहुत थी

अरमान थे कि उसको अपना जहां बनाएं
उसकी जहां में चाहत छा जाने की बहुत थी

कोशिश रही वफ़ा पर उंगली उठे न चर्चित
उसकी तमन्ना चर्चा में यूँ आने की बहुत थी


- VISHAAL CHARCHCHIT

शुक्रवार, अप्रैल 06, 2012

जय हो जय बजरंगी लाला....


जब से जागो तभी से सवेरा.....

होता है कभी - कभी यूँ भी कि
इंसान बिना जाने - समझे
मान बैठता है दिल की बात,
पकड़ लेता है एक ऐसी राह जो 
नहीं होती उसके लिए उपयुक्त
नहीं पहुँचती किसी मंजिल तक,
लेकिन चूंकि होता है एक जूनून
होते हैं ख्वाब जिनका पीछा करते
निकल जाता है बहुत दूर - बहुत आगे,
तब अचानक लगती है एक ठोकर,
बहुत तेज़ - बहुत ज़ोरदार कि
खुल जाती है जैसे उसकी आँख
हो जाता है अपनी गलती का एहसास,
लेकिन अब ?......क्या करे - क्या न करे
पीछे लौटे - आगे जाए - ठहर जाए
या फिर कोई नयी राह ली जाए......
अब टूट चुके होते हैं सारे ख्वाब
पूरी तरह से बुझ चुका होता है दिल
और हो चुका होता है एकदम निराश....
तभी एकाएक याद आती है उसे
बुजुर्गों से अक्सर ही सुनी हुई ये बात
कि जो होता है अच्छे के लिए होता है,
कुछ छूट जाने - कुछ खो जाने से
सब कुछ ख़त्म नहीं होता है.....
नहीं थी वो राह तुम्हारे लिए ठीक
अच्छा हुआ जो अभी लग गयी ठोकर
वर्ना आगे होती और ज्यादा तकलीफ,
उठो - खड़े होओ - और पकड़ो एक नयी राह,
अभी कुछ भी नहीं है बिगड़ा मत होओ निराश
क्योंकि जब से जागो तभी से सबेरा होता है......

- VISHAAL CHARCHCHIT

कुछ टूटे दिलों की दास्तान......

किसी का यूं अचानक 
ज़िन्दगी की राह में मिल जाना
कुछ बातें - मुलाकातें और
एक नशे की तरह 
दिलोदिमाग पर छा जाना....
और यूं लगने लगना कि
जैसे वो नहीं तो कुछ नहीं,
न सुबह - न दिन - न रात
सब कुछ उसी से शुरू और
उसी पर ख़त्म हो जाना......
फिर अचानक एक दिन
हालात का करवट बदलना,
साथ ही दो दिलों में 
तमाम जज़्बात का बदलना....
और एकाएक बहुत से
रहस्यों पर से परदे का उठना,
अपने पैरों के नीचे से 
जैसे जमीन का खिसकना....
पता ये चलना कि
वहाँ उस दिल में
नहीं रहते हो सिर्फ तुम ही,
वहाँ उन आँखों में नहीं
बसा करते हो सिर्फ तुम ही.....
बल्कि रहा करता है 
पूरा एक शहर - पूरा एक जहान,
अब होता है शुरू अपने ही
दिल में विचारों का घमासान,
हो जाती हैं अपने आप दूरियां
न चाहते हुए भी मजबूरिया.....
और हो जाती हैं दो राहें जुदा
दूर हो जाते हैं दो दिल
अलग हो जाती हैं दो जिंदगियां,
कौन सही - कौन गलत
नहीं समझ आती ये बारीकियां....
क्योंकि सबकुछ होता है अपनेआप
घटती हैं घटनाएं अपनेआप
और रह जाते हैं नाचते मंच पर
किसी कठपुतली की तरह दोनों
अलग - अलग - दूर - दूर.....
होता है कुछ ऐसा ही तमाम
उन धड़कते दिलों के साथ,
जो हुआ करते थे कभी साथ - साथ
और दिखते हैं खिंचे - खिंचे से आज....

- VISHAAL CHARCHCHIT

बुधवार, अप्रैल 04, 2012

माँ, जहां ख़त्म हो जाता है अल्फाजों का हर दायरा....


    माँ, जहां ख़त्म हो जाता है
        अल्फाजों का हर दायरा,
           नहीं हो पाते बयाँ
               वो सारे जज़्बात जो
               महसूस करता है हमारा दिल,
                 और आती हैं जेहन में
                     एक साथ वो तमाम बातें....

                         छाँव कितनी भी घनी हो
                               नहीं हो सकती सुहानी
                                  माँ के आँचल से ज्यादा....

                                     रिश्ता कितना भी गहरा हो
                                         नहीं हो सकता है कभी
                                           एक माँ के रिश्ते से गहरा...

                                              क्योंकि रिश्ते तो क्या
                                                  इस जहां से ही हमारा 
                                                    परिचय कराती है एक माँ ही,
                                                       हर एहसास - हर अलफ़ाज़ का 
                                                          मतलब भी बताती है एक माँ ही...

                                                               इसलिए माँ तुम्हारे बारे में
                                                                 क्या कह सकते हैं हम
                                                                    कुछ नहीं - कुछ नहीं - कुछ नहीं !!!
                                                                     
                                                                                     - VISHAAL CHARCHCHIT

सोमवार, अप्रैल 02, 2012

ख्वाब में ही सही रोज़ आया करो....


ख्वाब में ही सही रोज़ आया करो
मेरी रातों को रौशन बनाया करो

ये मुहब्बत यूँ ही रोज़ बढती रहे
इस कदर धडकनें तुम बढ़ाया करो

मैं यहाँ तुम वहाँ दूरियां हैं बहुत
अपनी बातों से इनको मिटाया करो

मुझको प्यारा तुम्हारा है गुस्सा बहुत
इसलिए तुम कभी रूठ जाया करो

मुझे घेरें कभी मायूसियां जो अगर
बच्चों सी दिल को तुम गुदगुदाया करो

तुमको मालूम है लोग जल जाते हैं
नाम मेरा लबों पे न लाया करो

जुड़ गयी ज़िन्दगी इसलिए तुम भी अब
नाम के आगे चर्चित लगाया करो

- VISHAAL CHARCHCHIT

रविवार, अप्रैल 01, 2012

समस्त मूर्खाधिपतियों की जय !!!!!

समस्त मूर्खाधिपतियों को नमन............क्योंकि आज आपका दिन यानी 1 अप्रैल अर्थात "फूल्स डे" है........यही एक त्यौहार है पूरे साल में जो आपके लिए रखा गया है........और पूरी दुनिया में धूमधाम से न सिर्फ मनाया जाता है बल्कि बिरादरी का विस्तार भी किया जाता है......ताकि आपकी ढेंचू - ढेंचू प्रजाति फलती - फूलती रहे........आपके कर्णप्रिय गर्दभ स्वर चहुँओर गूंजते रहे.......खैर आज के इस सुनहरे मौके पर सोचा मैं भी कुछ योगदान कर दूं.......मतलब कुछ लोगों को आपके समाज का रास्ता दिखा दूं.........लेकिन आश्चर्य कोई भी ऐसा नहीं मिला जिसे मूर्ख बनाया जा सके........जिसे देखो वही चौकन्ना है........सारे होशियार - सारे चालाक........सारे बनाने पर तुले.........हाय रे कलियुग......तूने सबको अपने रंग में रंग दिया.......कि अब नहीं है कोई सीधा - नहीं है कोई भोला - नहीं है कोई अंध भक्त कि जिसे मूर्ख बनाया जा सके.......इसके बावजूद धन्य हैं हमारे नेतागण.........बेचारे कितना पापड बेलते हैं - नाको चने चबाते है लेकिन 150 करोड़ लोगों को बेवकूफ बना ही ले जाते हैं......देखते ही देखते हजारों - लाखों करोड़ हमारी आँख के नीचे से खिसका ले जाते हैं........और हम सारे होशियार लोग गाल बजाते रह जाते हैं.......तो इसतरह ये आज का त्यौहार नेताओं और हम जनता - जनार्दन दोनों का त्यौहार है..........क्योंकि वे मूर्ख बनाते हैं और हम बनते हैं.........लेकिन हम नेताओं कि जय क्यों बोलें......हम तो अपने महापुरुषों कि जय बोलेंगे.........तो बोलो एक बार प्रेम से.....सभी मूर्खाधिपतियों की जय !!!!!