सोमवार, मई 26, 2014

निराश क्यों ???


शनिवार, मई 17, 2014

भोंपू भाइयों को नमन !!!


कामकाज छोड़ के
दिनोरात लगे रहे,
पंजा हो या झाड़ू
गला सबका कसे रहे..
हर गली - कूचे में
बम - बम किये रहे,
पप्पू और जीजा की
नाक में दम किये रहे...
हाथी को पिन मारा
साइकिल पंक्चर,
लालटेन बुझ गई
फूंके ऐसा मन्तर...
टीवी हो या पेपर
सबको पछाड़ दिया,
कोई खबर आयी नहीं
मोदी सा दहाड़ दिया...
जनता के घाव पर
मरहम लगाया किये,
उल्टा सीधा बोल के भी
जोश बढ़ाया किये...
मोदी खुद सोच में
कि कैसे चमत्कार हुआ,
इतना बड़ा सपना
कैसे साकार हुआ...
जय हो प्यारे भोंपुओं
तुमको नमन है,
तुमपे एक चालीसा
लिखने का मन है....

- विशाल चर्चित

मंगलवार, मई 06, 2014

/// कुछ क्षणिकाएँ.....आज के राजनैतिक परिदृश्य पर ///


गुमनामी से बौराये
एक बूढ़े नेता ने किया
विवाहित नवयौवना
के हाथ से
प्रेममय अमृतपान,
किया अपनी इस
तथाकथित विजय का ऐलान
जनता और मीडिया,
ने हाय तौबा मचाई
समस्त विश्व में
जमकर कु-ख्याति पाई
हुए अजर भी, और
शायद अमर भी...

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एक 'आम आदमी'
'खास आदमी' की तरह
झाड़ू से नाप रहा है दूरी
दिल्ली से वाराणसी की
देश मोह में या
सत्ता मोह में
ये तो पता नहीं, पर
गाली - थप्पड़ खाते हुए
और मुस्कुराते हुए...

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देश की करोड़ों
जनता का हाथ
रहा है करीब
सरसठ सालों से साथ,
अब इनका है हाथ
जनता के साथ,
जनता के मेहनत से
कमाये लाखों करोड़
खा जाने के लिए
पचा जाने के लिये...

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कह तो रहे हैं कि
लायेंगे राम राज्य,
और ये खिलायेंगे
खुशियों के कमल, पर-
चुनाव मे खर्च हुए
कई हजार करोड़,
वसूली के लिये कहीं
ये भी न दें
जनता को निचोड़...

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क्या हुआ जो हम हैं
एक क्षेत्रीय दल,
सरकार हो किसी की
अपना है समर्थन,
क्योंकि संसद में
अपने भी हैं
पच्चीस-तीस जन,
हम लूटेंगे - खायेंगे
या सरकार गिरायेंगे,
देश हित में
देश प्रेम के साथ...

- विशाल चर्चित

सोमवार, अप्रैल 28, 2014

बढ़ते विकल्प....भ्रमित जीवन...!!!

बढ़ते विकल्प
    सबकुछ की लालसा
           और भ्रमित जीवन...
                विषयों की भीड़
                       प्रसाद सी शिक्षा
                            ढेर सारा अपूर्ण ज्ञान...
उत्सवों की भरमार
    बढती चमक दमक
          घटता आनंद...
                 व्यंजनों की कतारें
                       खाया बहुत कुछ
                              फिर भी असंतुष्टि...
सैकड़ों चैनल
    दिन-रात कार्यक्रम
          पर मनोरंजन शून्य...
                 रिश्ते ही रिश्ते
                      बढ़ती औपचारिकता
                             और घटता अपनापन...
अनगिनत नियम कानून
    बढ़ते दाँव - पेच
          और बढ़ता भ्रष्टाचार...
                फलती-फूलती बौद्धिकता
                      सूखते-सिकुड़ते हृदय
                              और दूभर होती श्वास...
अनेकों सूचना माध्यम
     सुगम होती पहुँच
            फिर भी घटता संपर्क...
                   फैलती तकनीक
                         बढ़्ती सुविधायें
                               घटती सुख-शान्ति...
हजारों से जुड़ाव
     सैकड़ों से बातचीत
           फिर भी अकेले हम...

                    - विशाल चर्चित

रविवार, मार्च 23, 2014

इस देश को तो बस आम औरत चलायेगी.....



सुनो जी,
सुना है तुमने
चुनाव चिन्ह
हमारा झाड़ू चुना है?
हम भी
चुनाव चिन्ह
अपना बेलन चुने क्या?
सड़क पर सरेआम
तुम्हारे सिर पर
धुनें क्या?
गंदगी करो तुम
और सफाई करे हम?
झाड़ू ले के भर रहे
आम आदमी का दम?
घर तो संभलता नहीं
देश क्या सँभालोगे,
दो बच्चे तो पलते नहीं
करोड़ों तुम क्या पालोगे?
इस देश को तो बस
आम औरत चलायेगी,
संसद में ढंग से
अब चूल्हा जलायेगी...
नेता निकम्मों पे
अब चिमटा चलेगा,
मक्कारों के सिर पे
अब बेलन बजेगा...
सरकारी कचरे पे
झाड़ू लगा देंगे,
जहां दाग-धब्बे हों
पोछा लगा देंगे...
रिश्वत जमाखोरी
कालाबाजारी,
निपटेगी इनसे
अब सैन्डल हमारी...
हरामखोरी बंद अब
काम सब करेंगे,
अमीरों का कुछ हिस्सा
गरीबों के नाम करेंगे...
बातें भी खूब होंगी
काम भी खूब होगा,
देश के मेकअप का
तामझाम भी खूब होगा...
मंदिर और मस्जिद
के लफड़े जो होंगे,
जानलेवा नहीं
मुंह के झगड़े ही होंगे...
तू-तू-मैं-मैं करके
मुंह हम फुला लेंगे,
कभी खुश हुए तो
हम ही बुला लेंगे...
मोलभाव का जौहर हम
पूरी दुनिया में दिखायेंगे,
अपना सामान महँगा और
दूसरे का सस्ता हम करायेंगे...
भैया, बेटा, मुन्ना
और बाबू कर करके,
दिखा देंगे दुनिया पर
राज भी हम करके...
चर्चित तुम्हे इस मुहिम में
हमारे साथ रहना है,
कविताबाजी छोड़ो तुम्हें
कान्हा जैसा बनना है...

- विशाल चर्चित